बस बहुत हुआ , अब और कितने दंश सहूँ ?
मांग चुका सौ बार फलक को |
अब और कितनी बार कहूँ ?
चला था छूने आसमान को ,
चलना शुरू नही कर पाया हूँ |
चाहता था सोना बनना , पर सांचे में ,
ढलना शुरू नही कर पाया हूँ |
अपने इस स्वप्न पर ,
और कितने निबंध लिखूँ ?
माना स्वर्णिम है वहां तक जाना , पर उस जगह पर ,
और कितने छंद लिखूँ ?
कमी मेरी कोशिश में ही है ,
दोष कब तक भाग्य पर मदुं ?
नतीजा वैसा ही होगा ,
जैसे इस लडाई को लडूं |
कुछ करना ही होगा मुझे ,
कब तक यूँ कमज़ोर रहूँ ?
खुद से वादा करना होगा ,
तुमसे कितनी बार कहूँ ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
गुरुवार, 7 मई 2009
बुधवार, 6 मई 2009
कख छ वु |
सुबेर साम ढूँढनु छ ,
कोणा कोणा देख्णु छ |
जु म्यार जिकुड़ी मा बस ग्यायी ,
कख छ व् छोरी , कख छ वु ?
सौ मुखडी देखिक ,
कुई नि पसंद ऐई |
जु देखि येकि मुखडी ,
जिकुड़ी धक् हुए ग्यायी |
अब सुदि बैठि ,
वैकु नां रटणु छ |
रात बिटिक सुबेर तलक ,
सुंदर सुपना आणु छ |
बिजां चतुर छोरी छ ,
दूर बीटी मुस्कांदी |
पास आन्दु जु मि कदी ,
टप जानी कख लुक जांदी |
यारों कुई छुई ,
हुई नि वैकि गैल |
चल गयुं जनुअरी ,
चल गयुं अप्रैल |
अब प्राण मेरा ,
तड़पणु बिना वैकु |
मिल जाई वु मितैं ,
कख छ व् छोरी , कख छ वु ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
कोणा कोणा देख्णु छ |
जु म्यार जिकुड़ी मा बस ग्यायी ,
कख छ व् छोरी , कख छ वु ?
सौ मुखडी देखिक ,
कुई नि पसंद ऐई |
जु देखि येकि मुखडी ,
जिकुड़ी धक् हुए ग्यायी |
अब सुदि बैठि ,
वैकु नां रटणु छ |
रात बिटिक सुबेर तलक ,
सुंदर सुपना आणु छ |
बिजां चतुर छोरी छ ,
दूर बीटी मुस्कांदी |
पास आन्दु जु मि कदी ,
टप जानी कख लुक जांदी |
यारों कुई छुई ,
हुई नि वैकि गैल |
चल गयुं जनुअरी ,
चल गयुं अप्रैल |
अब प्राण मेरा ,
तड़पणु बिना वैकु |
मिल जाई वु मितैं ,
कख छ व् छोरी , कख छ वु ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मंगलवार, 5 मई 2009
पीछे मुड़कर देख तू
चला कहाँ से ?
कहाँ खड़ा है ?
दे विचार एक तू |
पीछे मुड़कर देख तू |
तेरे साथ कितने चले ,
लेकिन सब भागे नही |
तू भागा बहुत तेज़ ,
पर है सबसे आगे नही |
इतना आगे तू आया ,
क्या यह इतना आसान है ?
पीछे होकर तुझसे किसीने ,
क्या किया एहसान है ?
हमेशा तू हारा नही ,
कभी हुई तेरी जीत भी है |
उन्ही जीतों के लम्हों से ,
आज जुड़कर देख तू |
उतार फेंक यह उदासी ,
हैरान हो मत झेंप तू |
यह तेरा ही बीता कल है ,
ज़रा पीछे मुड़कर देख तू |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
कहाँ खड़ा है ?
दे विचार एक तू |
पीछे मुड़कर देख तू |
तेरे साथ कितने चले ,
लेकिन सब भागे नही |
तू भागा बहुत तेज़ ,
पर है सबसे आगे नही |
इतना आगे तू आया ,
क्या यह इतना आसान है ?
पीछे होकर तुझसे किसीने ,
क्या किया एहसान है ?
हमेशा तू हारा नही ,
कभी हुई तेरी जीत भी है |
उन्ही जीतों के लम्हों से ,
आज जुड़कर देख तू |
उतार फेंक यह उदासी ,
हैरान हो मत झेंप तू |
यह तेरा ही बीता कल है ,
ज़रा पीछे मुड़कर देख तू |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
आज दिन कुछ और है
आज मन व्याकुल बड़ा हो रहा |
भविष्य सोच कर परेशान बड़ा हो रहा |
सोचता है , अभी तक सिर्फ़ इतना ही ज़ोर लगा पाया हूँ |
की अपनी नाव नदी के छोर लगा पाया हूँ |
दूर मंजिल हो तो , राह नही आसान कभी |
लहरें होंगी बड़ी बड़ी , बिजली और तूफ़ान भी |
कल तक इन बातों से , भय नही लग रहा था |
आज लगता जो असम्भव , कल सम्भव लग रहा था |
पार करने की सोचता हूँ सागर को ,
अभी छोटे भंवर ही सह पाया हूँ |
कितना कमज़ोर महसूस कर रहा हूँ ,
कहाँ किसीसे कह पाया हूँ |
धीरे धीरे मेरा मनोबल रहा तोड़ है |
और दिनों जैसा नही , आज दिन कुछ और है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
भविष्य सोच कर परेशान बड़ा हो रहा |
सोचता है , अभी तक सिर्फ़ इतना ही ज़ोर लगा पाया हूँ |
की अपनी नाव नदी के छोर लगा पाया हूँ |
दूर मंजिल हो तो , राह नही आसान कभी |
लहरें होंगी बड़ी बड़ी , बिजली और तूफ़ान भी |
कल तक इन बातों से , भय नही लग रहा था |
आज लगता जो असम्भव , कल सम्भव लग रहा था |
पार करने की सोचता हूँ सागर को ,
अभी छोटे भंवर ही सह पाया हूँ |
कितना कमज़ोर महसूस कर रहा हूँ ,
कहाँ किसीसे कह पाया हूँ |
धीरे धीरे मेरा मनोबल रहा तोड़ है |
और दिनों जैसा नही , आज दिन कुछ और है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
रविवार, 3 मई 2009
फुक्ग्युं यख दिल्ली मा
हला भैजी कन छ ?
बदली छाई होली वख टीरी मा |
यखी त बस आग छ , फुन्कग्युं यख दिल्ली मा |
तनखा बिजां कम हुएगी , रेणा छन तंगी मा |
कोड मा खाज हुएगी , ऐ छोरा , एन मंदी मा |
कोई अपणु नि छ यख , सब मतलब का दगडी छन |
खूब खाई मिन धोखा , पर भैजी अब क्या कन ?
यख सुबेर सात बजेक बीटी , घनी घाम लग जांदी |
यख वख बाटा मा , सुंगर जाम लग जांदी |
जखी देखा , वखी सरा- सरी मच्युन छ |
पैसा का वास्ता , मारा मारी मच्युन छ |
यु माहौल मीतें , रास नि आणु छ |
फंड फुकी येतें , मी घौर आणु छ |
घौर एके , दाल भात खेके , रौला तस्सली मा |
कंदुडी पकड़दों , फुक्ग्युं यख दिल्ली मा |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
बदली छाई होली वख टीरी मा |
यखी त बस आग छ , फुन्कग्युं यख दिल्ली मा |
तनखा बिजां कम हुएगी , रेणा छन तंगी मा |
कोड मा खाज हुएगी , ऐ छोरा , एन मंदी मा |
कोई अपणु नि छ यख , सब मतलब का दगडी छन |
खूब खाई मिन धोखा , पर भैजी अब क्या कन ?
यख सुबेर सात बजेक बीटी , घनी घाम लग जांदी |
यख वख बाटा मा , सुंगर जाम लग जांदी |
जखी देखा , वखी सरा- सरी मच्युन छ |
पैसा का वास्ता , मारा मारी मच्युन छ |
यु माहौल मीतें , रास नि आणु छ |
फंड फुकी येतें , मी घौर आणु छ |
घौर एके , दाल भात खेके , रौला तस्सली मा |
कंदुडी पकड़दों , फुक्ग्युं यख दिल्ली मा |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
प्रेम , तुम थम जाओ
अभी बहुत व्यस्त हूँ , मेरे रस्ते में मत आओ |
सुनो प्रेम , तुम थम जाओ |
तुम में बह जाना , भला तो है , तुम्हारा न होना , खला तो है |
पर अभी सही समय नही , बहुत कुछ जीवन में करने को , बचा तो है |
कर लूँ पूरी अभिलाषा अपनी ,फिर तुम्हारी सुनूंगा |
तुम्हारे बाग़ से एक फूल , भी तभी चुनुँगा |
एक स्थिति के बाद ही , यह सब अच्छा लगता है |
वरना लगता , है तो पकवान , पर रह गया कच्चा है |
इसीलिए चाहता हूँ , मेरे विचारों में जरा कम आओ |
सुनो प्रेम , तुम थम जाओ |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
सुनो प्रेम , तुम थम जाओ |
तुम में बह जाना , भला तो है , तुम्हारा न होना , खला तो है |
पर अभी सही समय नही , बहुत कुछ जीवन में करने को , बचा तो है |
कर लूँ पूरी अभिलाषा अपनी ,फिर तुम्हारी सुनूंगा |
तुम्हारे बाग़ से एक फूल , भी तभी चुनुँगा |
एक स्थिति के बाद ही , यह सब अच्छा लगता है |
वरना लगता , है तो पकवान , पर रह गया कच्चा है |
इसीलिए चाहता हूँ , मेरे विचारों में जरा कम आओ |
सुनो प्रेम , तुम थम जाओ |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शुक्रवार, 1 मई 2009
किस काम की
सुबह से ही , प्रतीक्षा होती , एक सिन्दूरी शाम की |
फीकी सी ही बीत जाए , वह शाम किस काम की |
नशा होता जिसमें गहरा , वाह - वाह होती उस जाम की|
जो चढा सुरूर उतारे , वह सुरा किस काम की |
जहाँ देवता न बसते , कौन सुध लेता उस धाम की |
जिससे दर्द कम न होता , वो दवा किस काम की |
जिसे कोई न पहचाने , क्या बात हो उस नाम की |
जिससे कुछ खरीद न पाये , वो मुद्रा किस काम की |
रंग न हो जिसमें भरा , वो स्मृति किस काम की |
मन पुलकित न हो जिसे पढ़कर , ऐसी कृति किस काम की |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
फीकी सी ही बीत जाए , वह शाम किस काम की |
नशा होता जिसमें गहरा , वाह - वाह होती उस जाम की|
जो चढा सुरूर उतारे , वह सुरा किस काम की |
जहाँ देवता न बसते , कौन सुध लेता उस धाम की |
जिससे दर्द कम न होता , वो दवा किस काम की |
जिसे कोई न पहचाने , क्या बात हो उस नाम की |
जिससे कुछ खरीद न पाये , वो मुद्रा किस काम की |
रंग न हो जिसमें भरा , वो स्मृति किस काम की |
मन पुलकित न हो जिसे पढ़कर , ऐसी कृति किस काम की |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
सदस्यता लें
संदेश (Atom)