मुझे यही लगता रहा ,
अकेला चलना दिन रात है |
पर जब भी ऊपर देखा ,
पाया , इश्वर तू मेरे साथ है |
अब तक जितनी बिगड़ी ,
बनी मेरी बात है |
पूरी और पूरी तरह ,
इसमें तेरा हाथ है |
जितना कुछ पाया जीवन में ,
सब तेरी सौगात है |
कुछ खोने पर कोस देता हूँ तुझे ,
कितनी आपस की बात है !
तुच्छ हूँ बहुत मैं ,
मेरी क्या औकात है ?
जो भी हूँ ,इसलिए हूँ ,
क्यूंकि तू मेरे साथ है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
गुरुवार, 14 मई 2009
बुधवार, 13 मई 2009
पी गटागट जाता हूँ |
दिन भर मगज मार कर ,
आख़िर जब थक जाता हूँ |
हाथ ले शब्दों के काढे को ,
पी गटागट जाता हूँ |
पीकर उसको , मुझको ,
मद्धम सा नशा होता है |
विवरण से परे है उसमें ,
सच , ऐसा मज़ा होता है |
दुनिया अलग दिखायी देती है ,
अनसुनी बातें सुनाई देतीं हैं |
मन आवारा हो , भागा फिरता ,
इच्छाएं अंगडाई लेती हैं |
लिख कर दो एक पंक्ति ,
यह नशा तुममे बाँट जाता हूँ |
ज्यूँ ही कम होता है यह ,
फ़िर पी गटागट जाता हूँ |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
आख़िर जब थक जाता हूँ |
हाथ ले शब्दों के काढे को ,
पी गटागट जाता हूँ |
पीकर उसको , मुझको ,
मद्धम सा नशा होता है |
विवरण से परे है उसमें ,
सच , ऐसा मज़ा होता है |
दुनिया अलग दिखायी देती है ,
अनसुनी बातें सुनाई देतीं हैं |
मन आवारा हो , भागा फिरता ,
इच्छाएं अंगडाई लेती हैं |
लिख कर दो एक पंक्ति ,
यह नशा तुममे बाँट जाता हूँ |
ज्यूँ ही कम होता है यह ,
फ़िर पी गटागट जाता हूँ |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मंगलवार, 12 मई 2009
कहाँ से लाऊं ?
इतने तूफ़ान भरे हैं दिल में \\
बयान करने के लिए ,
शब्द कहाँ से लाऊं ?
दर्द बढ़ता जा रहा हद से \\
उसे बाटने के लिए ,
हमदर्द कहाँ से लाऊं ?
ताप बढती जा रही धूप की \\
ठंडक पहुंचाए जो मन को वह ,
ऋतु शरद कहाँ से लाऊं ?
मेरे ऊपर बना रहे हमेशा ,
स्नेही , दयालु , शुभेछु वह ,
वरद हस्त कहाँ से लाऊं ?
अकेले ही चलता आया अभी तक \\
अब इस सूने बीहड़ में एक ,
और मुसाफिर कहाँ से लाऊं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
बयान करने के लिए ,
शब्द कहाँ से लाऊं ?
दर्द बढ़ता जा रहा हद से \\
उसे बाटने के लिए ,
हमदर्द कहाँ से लाऊं ?
ताप बढती जा रही धूप की \\
ठंडक पहुंचाए जो मन को वह ,
ऋतु शरद कहाँ से लाऊं ?
मेरे ऊपर बना रहे हमेशा ,
स्नेही , दयालु , शुभेछु वह ,
वरद हस्त कहाँ से लाऊं ?
अकेले ही चलता आया अभी तक \\
अब इस सूने बीहड़ में एक ,
और मुसाफिर कहाँ से लाऊं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
नज़र आई है |
देख लिया बहुत , यूँही दूर दूर से ,
वह मंजिल पाने की , अब कसक उठ आई है \\
चलते चलते लगता , वह नज़र आई है ,
पथराई आंखों में एक चमक नज़र आई है \\
मुरझाये से चेहरे पर , थोडी सी दमक आई है ,
मुझसे तेज़ चलने लगी , अब मेरी परछाई है \\
क्या लोग थे वे , जो पहुंचे वहां तक ,
मेरी तो अभी से ही , साँस फूल आई है \\
इस पर ही सब्र करता हूँ की ,
राह चाहे जैसी भी है , ग़लत नही ,
आख़िर इसमे मंजिल नज़र आई है \\
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
वह मंजिल पाने की , अब कसक उठ आई है \\
चलते चलते लगता , वह नज़र आई है ,
पथराई आंखों में एक चमक नज़र आई है \\
मुरझाये से चेहरे पर , थोडी सी दमक आई है ,
मुझसे तेज़ चलने लगी , अब मेरी परछाई है \\
क्या लोग थे वे , जो पहुंचे वहां तक ,
मेरी तो अभी से ही , साँस फूल आई है \\
इस पर ही सब्र करता हूँ की ,
राह चाहे जैसी भी है , ग़लत नही ,
आख़िर इसमे मंजिल नज़र आई है \\
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शनिवार, 9 मई 2009
कौन हूँ मैं ?
कभी अकेले में , जो पूछा ख़ुद से |
इस सवाल पर मौन हूँ मैं |
आख़िर , कौन हूँ मैं ?
बाहर जो दिखता जग को ,
क्या वैसा ही भीतर हूँ मैं ?
इतनी बड़ी है यह दुनिया ,
और कितना गौण हूँ मैं ?
इस विशाल समुद्र में ,
क्या एक लहर हूँ मैं ?
गिरी हो प्रलय की गाज जिस पर ,
क्या उजड़ा वह शहर हूँ मैं ?
हवा से उड़ता रहा ,
क्या एक पतंग हूँ मैं ?
या जो जड़ा रहा ,
वह एक स्तम्भ हूँ मैं ?
अपनी ही नज़र में , कभी नायक ,
कभी खलनायक हूँ मैं |
कौन हूँ मैं आख़िर ,
क्या इसका उत्तर देने लायक हूँ मैं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
इस सवाल पर मौन हूँ मैं |
आख़िर , कौन हूँ मैं ?
बाहर जो दिखता जग को ,
क्या वैसा ही भीतर हूँ मैं ?
इतनी बड़ी है यह दुनिया ,
और कितना गौण हूँ मैं ?
इस विशाल समुद्र में ,
क्या एक लहर हूँ मैं ?
गिरी हो प्रलय की गाज जिस पर ,
क्या उजड़ा वह शहर हूँ मैं ?
हवा से उड़ता रहा ,
क्या एक पतंग हूँ मैं ?
या जो जड़ा रहा ,
वह एक स्तम्भ हूँ मैं ?
अपनी ही नज़र में , कभी नायक ,
कभी खलनायक हूँ मैं |
कौन हूँ मैं आख़िर ,
क्या इसका उत्तर देने लायक हूँ मैं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
वह समय आ गया है !
ज़ोर शोर से , जाने कब से, तैयारी करता रहा ?
छोटे छोटे ही सही , कदम उठा बढ़ता रहा
अब उस तैयारी का इम्तहान आ गया है
साबित कर के दिखा खुदको
वह समय आ गया है !
कितनी बार गिरा है तू , इसका कोई हिसाब नही
पर जिस हिम्मत से उठा है , उसका कोई जवाब नही
अपनी तस्वीर को तू कबसे , रोज़ मिटा - बना रहा है
लहू और पसीने से , हमेशा सना रहा है
उस लहू की गर्मी अब दिखेगी जग को ,
हाँ, वह समय आ गया है
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
छोटे छोटे ही सही , कदम उठा बढ़ता रहा
अब उस तैयारी का इम्तहान आ गया है
साबित कर के दिखा खुदको
वह समय आ गया है !
कितनी बार गिरा है तू , इसका कोई हिसाब नही
पर जिस हिम्मत से उठा है , उसका कोई जवाब नही
अपनी तस्वीर को तू कबसे , रोज़ मिटा - बना रहा है
लहू और पसीने से , हमेशा सना रहा है
उस लहू की गर्मी अब दिखेगी जग को ,
हाँ, वह समय आ गया है
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शुक्रवार, 8 मई 2009
इच्छाएं कितनी ?
क्या पता इन सबकी ,
प्यास कभी मिटनी है ?
इनकी कोई गिनती नही ,
मानव इच्छाएं कितनी हैं ?
बचपन से ही मानव ,
इच्छा पर इच्छा पाले जाता |
छोटे से बर्तन में ,
और और डाले जाता |
अपनी इच्छाएं लेकर ,
रात रात जागता रहता |
मृग तृष्णाये बनाकर उनको ,
उनके पीछे भागता रहता |
उतनी फिर से पैदा हो जाती ,
पूरी करता जितनी है |
मर जाता मानव , यह रह जातीं ,
मानव इच्छाएं कितनी हैं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
प्यास कभी मिटनी है ?
इनकी कोई गिनती नही ,
मानव इच्छाएं कितनी हैं ?
बचपन से ही मानव ,
इच्छा पर इच्छा पाले जाता |
छोटे से बर्तन में ,
और और डाले जाता |
अपनी इच्छाएं लेकर ,
रात रात जागता रहता |
मृग तृष्णाये बनाकर उनको ,
उनके पीछे भागता रहता |
उतनी फिर से पैदा हो जाती ,
पूरी करता जितनी है |
मर जाता मानव , यह रह जातीं ,
मानव इच्छाएं कितनी हैं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
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