कभी भुला न पाऊं जो,
तुम आज वो अंदाज़ न दो |
इस रात की तन्हाई में ,
तुम आज मुझे आवाज़ न दो |
ज़ेहन में बजते रहें देर तक ,
तुम आज वो साज़ न दो |
भूले बिसरे मेरे गीतों को ,
तुम आज अपनी आवाज़ न दो |
कितनी हैं हमे बेकरारी ।
तुम आज इसका हिसाब न दो |
दिल में हैं जो आरज़ू,
तुम आज उन्हें आवाज़ न दो|
मेरे फ़िज़ूल की ख़्वाबों में ,
तुम आज अपना एहसास न दो |
सोने ही दो उन ख़्वाबों को ,
तुम आज उन्हें आवाज़ न दो |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शनिवार, 12 मार्च 2011
शुक्रवार, 11 मार्च 2011
मेरी किस्मत
मेरी किस्मत में आराम नहीं |
क्यूंकि मैं यह खुद लिखता हूँ ,
मैं लकीरों का गुलाम नहीं |
मेरी किस्मत में वसीयत नहीं |
क्यूंकि जों बना हूँ , खुद बना हूँ ,
मांगने की अपनी तबियत नहीं |
मेरी किस्मत में रईसी नहीं |
क्यूंकि जैसी देखी है मैंने ,
ऐसी होने से, तो नहीं ही सही |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
क्यूंकि मैं यह खुद लिखता हूँ ,
मैं लकीरों का गुलाम नहीं |
मेरी किस्मत में वसीयत नहीं |
क्यूंकि जों बना हूँ , खुद बना हूँ ,
मांगने की अपनी तबियत नहीं |
मेरी किस्मत में रईसी नहीं |
क्यूंकि जैसी देखी है मैंने ,
ऐसी होने से, तो नहीं ही सही |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
गुरुवार, 10 मार्च 2011
दिन का हिसाब ...
रात को तनहा , जब लेटता हूँ
गुज़रे दिन के टुकड़े , आँखों में समेटता हूँ
तोलता हूँ , मैंने क्या खोया , क्या पाया ?
मैं क्या भूला , क्या साथ ले आया ?
लम्हे, कुछ देखने, कुछ फेंकने लायक
कुछ अनमने से , कुछ सहेजने लायक
इनको तोलते, हिसाब लगते जाने कब ,
मन की बहती भर जाती है
और डूबते सूरज की तरह धीरे धीरे ,
मेरी आँख लग जाती है
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
गुज़रे दिन के टुकड़े , आँखों में समेटता हूँ
तोलता हूँ , मैंने क्या खोया , क्या पाया ?
मैं क्या भूला , क्या साथ ले आया ?
लम्हे, कुछ देखने, कुछ फेंकने लायक
कुछ अनमने से , कुछ सहेजने लायक
इनको तोलते, हिसाब लगते जाने कब ,
मन की बहती भर जाती है
और डूबते सूरज की तरह धीरे धीरे ,
मेरी आँख लग जाती है
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शनिवार, 1 जनवरी 2011
साल दर साल ...
साल दर साल उम्र की दीवारें लांघता हूँ ,
पर हर दीवार के पार की घास ,
जाने क्यूँ सूखती हुई मिलती है |
साल दर साल कुछ लकीरें ,
माथे पर खिंचती जा रही हैं ,
जाने क्यूँ गहराती हुई मिलती हैं |
साल दर साल मेरी नज़र ,
किसी शीशे पे पड़ती सांस सी ,
जाने क्यूँ धुंधलाती हुई मिलती है |
साल दर साल मेरी परछाई ,
जैसे चिढ़ी है मुझसे किसी बात पर,
जाने क्यूँ झुंझलाती हुई मिलती है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
पर हर दीवार के पार की घास ,
जाने क्यूँ सूखती हुई मिलती है |
साल दर साल कुछ लकीरें ,
माथे पर खिंचती जा रही हैं ,
जाने क्यूँ गहराती हुई मिलती हैं |
साल दर साल मेरी नज़र ,
किसी शीशे पे पड़ती सांस सी ,
जाने क्यूँ धुंधलाती हुई मिलती है |
साल दर साल मेरी परछाई ,
जैसे चिढ़ी है मुझसे किसी बात पर,
जाने क्यूँ झुंझलाती हुई मिलती है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शनिवार, 13 नवंबर 2010
कहाँ से लाऊं ?
कुछ कसक सी है सीने में,
इसकी दवा कहाँ से लाऊं ?
मुझे लिखने का मर्ज़ है ,
लिखता हूँ जब तक दर्द रहे |
ये ज़िन्दगी ही वजह है इनकी ,
कोई और वजह कहाँ से लाऊं ?
वक़्त चलता रहता है ,
जैसे पानी बहता रहता है |
जों भी है बस अभी है ,
दूजा वक़्त कहाँ से लाऊं ?
ख्यालों के भी कुछ तिनके ,
डूबते उतरते रहते हैं जेहन में |
दरिया एक है , ख्याल बहुत ,
एक और जेहन कहाँ से लाऊं ?
मंज़िल एक है , राह कई ,
लेकिन केवल एक सही |
सही है पर बहुत मुश्किल ,
आसान कहाँ से लाऊं ?
उड़ने की चाह है मुझे ,
पंख तो उगा लिए हैं मैंने |
उड़ान भरने को लेकिन खुला ,
आसमान कहाँ से लाऊं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
इसकी दवा कहाँ से लाऊं ?
मुझे लिखने का मर्ज़ है ,
लिखता हूँ जब तक दर्द रहे |
ये ज़िन्दगी ही वजह है इनकी ,
कोई और वजह कहाँ से लाऊं ?
वक़्त चलता रहता है ,
जैसे पानी बहता रहता है |
जों भी है बस अभी है ,
दूजा वक़्त कहाँ से लाऊं ?
ख्यालों के भी कुछ तिनके ,
डूबते उतरते रहते हैं जेहन में |
दरिया एक है , ख्याल बहुत ,
एक और जेहन कहाँ से लाऊं ?
मंज़िल एक है , राह कई ,
लेकिन केवल एक सही |
सही है पर बहुत मुश्किल ,
आसान कहाँ से लाऊं ?
उड़ने की चाह है मुझे ,
पंख तो उगा लिए हैं मैंने |
उड़ान भरने को लेकिन खुला ,
आसमान कहाँ से लाऊं ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मंगलवार, 2 नवंबर 2010
तुम कौन हो ?
ठण्ड की गर्म धूप हो तुम ,
या नदी की मस्त लहर ?
मुंडेर की पगडण्डी हो या ,
मनमौजी टेढ़ी नहर |
चांदनी हो सकती हो तुम ,
पर इतनी उसकी लौ नहीं |
सपनों में मुझे बुलाता है जों ,
क्या तुम ही हो , कोई और नहीं ?
खुशबू का झोंका हो तुम ,
या बारिश का छींटा हो ?
अनकहा अरमान हो कोई ,
जों उम्मीद पे ही जीता हो ?
डर से छुपायी बात हो तुम ,
या गुनगुनाया गीत कोई ?
अनजाने से दिखते हो ,
या लगते अपने मीत कोई ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
या नदी की मस्त लहर ?
मुंडेर की पगडण्डी हो या ,
मनमौजी टेढ़ी नहर |
चांदनी हो सकती हो तुम ,
पर इतनी उसकी लौ नहीं |
सपनों में मुझे बुलाता है जों ,
क्या तुम ही हो , कोई और नहीं ?
खुशबू का झोंका हो तुम ,
या बारिश का छींटा हो ?
अनकहा अरमान हो कोई ,
जों उम्मीद पे ही जीता हो ?
डर से छुपायी बात हो तुम ,
या गुनगुनाया गीत कोई ?
अनजाने से दिखते हो ,
या लगते अपने मीत कोई ?
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
सोमवार, 1 नवंबर 2010
बात चली
आगे रात चली , पीछे बात चली |
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , कोई बात चली |
राज रानी की , आग पानी की |
कही अनकही , नयी पुरानी की |
ले अपने रंग सात चली ,
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , बात चली |
कुछ अपनों की , कुछ सपनों की |
कुछ किस्सों की , कोई कहानी की |
ले यादों की बारात चली ,
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , बात चली |
ओस की बूँदें , आँखें खुली - मूंद के |
उनमें कुछ खोकर , कुछ ढूंढ के |
दे कोई सौगात चली ,
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , बात चली |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , कोई बात चली |
राज रानी की , आग पानी की |
कही अनकही , नयी पुरानी की |
ले अपने रंग सात चली ,
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , बात चली |
कुछ अपनों की , कुछ सपनों की |
कुछ किस्सों की , कोई कहानी की |
ले यादों की बारात चली ,
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , बात चली |
ओस की बूँदें , आँखें खुली - मूंद के |
उनमें कुछ खोकर , कुछ ढूंढ के |
दे कोई सौगात चली ,
रात रात भर , बात बात में ,
साथ साथ में , बात चली |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
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