दो नैना हैं खुली किताब से ,
इन नैनो से बात करो ,
इन नैनो की बात करो |
झुकते , उठते ,कहते सुनते ,
यादों की सौगात भरो ,
इन नैनो की बात करो |
कितने भोले , कितने पाक हैं ये ,
नैनो से ही एहसास करो ,
इन नैनो की बात करो |
हर एक अदा एक नज़म है इनकी ,
इनपर भी शायरी गुलज़ार करो ,
इन नैनो की बात करो |
थके हुए हैं पलके उठाये ,
इनपर भी थोड़ा गौर करो ,
इन नैनो की बात करो |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मंगलवार, 22 मार्च 2011
मैं ... मेरे प्रयास
मैं चला हूँ लक्ष्य पाने को ,
सूर्य आप मुझपर दृष्टि रखना |
जों मुझे न मिले पथ आगे,
विवेक आप मार्ग सृष्टि करना |
अति हो जाए जों विपदा की आग ,
ध्येय आप वृष्टि करना |
असमंजस हो यदि मुझे ,
धर्म आप कोई युक्ति करना |
परीक्षा हो पराक्रम की ,
मनोबल आप शक्ति भरना |
अँधेरा हो अज्ञान का ,
ज्ञान आप तम हरना |
प्रयास हो जाए मेरे सार्थक ,
इश्वर आप कृपा करना |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
सूर्य आप मुझपर दृष्टि रखना |
जों मुझे न मिले पथ आगे,
विवेक आप मार्ग सृष्टि करना |
अति हो जाए जों विपदा की आग ,
ध्येय आप वृष्टि करना |
असमंजस हो यदि मुझे ,
धर्म आप कोई युक्ति करना |
परीक्षा हो पराक्रम की ,
मनोबल आप शक्ति भरना |
अँधेरा हो अज्ञान का ,
ज्ञान आप तम हरना |
प्रयास हो जाए मेरे सार्थक ,
इश्वर आप कृपा करना |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मंगलवार, 15 मार्च 2011
रोज़...
इन सूरज को ढकती इमारतों को देखता हूँ ,
रोज़ इनका कद बढ़ जाता है |
इन बदहवास सी भागती सड़कों को देखता हूँ ,
रोज़ इन पर कुछ लड़ जाता है |
इन घरों को जगते हुए देखता हूँ ,
रोज़ कुछ न कुछ कम पड़ जाता है |
इन मंदिर मस्जिदों को थकते हुए देखता हूँ ,
रोज़ जहां फरियादें सर मढ़ जाता है |
इन दीवारों को घूरते हुए देखता हूँ ,
रोज़ कहीं ध्यान गढ़ जाता है |
इन बुत से चेहरों को देखता हूँ ,
रोज़ कोई इनपे मुस्कान जड़ जाता है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
रोज़ इनका कद बढ़ जाता है |
इन बदहवास सी भागती सड़कों को देखता हूँ ,
रोज़ इन पर कुछ लड़ जाता है |
इन घरों को जगते हुए देखता हूँ ,
रोज़ कुछ न कुछ कम पड़ जाता है |
इन मंदिर मस्जिदों को थकते हुए देखता हूँ ,
रोज़ जहां फरियादें सर मढ़ जाता है |
इन दीवारों को घूरते हुए देखता हूँ ,
रोज़ कहीं ध्यान गढ़ जाता है |
इन बुत से चेहरों को देखता हूँ ,
रोज़ कोई इनपे मुस्कान जड़ जाता है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
सोमवार, 14 मार्च 2011
देखो, फिर आया बसंत है |
ठण्ड की हुई छुट्टी ,
सुबह शाम दिखती बची कुची |
ये मौसम सब को पसंद है ,
देखो , फिर आया बसंत है |
स्वेटर , मौजे बंद ट्रंक में ,
अगले साल निकलेंगे ठण्ड में |
अब कुछ दिन तो आनंद है ,
देखो, फिर आया बसंत है |
होली की भी धूम होगी ,
होना हल्ला गुल्ला , हुड़दंग है |
हर तरफ छाने रंग हैं ,
देखो, फिर आया बसंत है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
सुबह शाम दिखती बची कुची |
ये मौसम सब को पसंद है ,
देखो , फिर आया बसंत है |
स्वेटर , मौजे बंद ट्रंक में ,
अगले साल निकलेंगे ठण्ड में |
अब कुछ दिन तो आनंद है ,
देखो, फिर आया बसंत है |
होली की भी धूम होगी ,
होना हल्ला गुल्ला , हुड़दंग है |
हर तरफ छाने रंग हैं ,
देखो, फिर आया बसंत है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
रविवार, 13 मार्च 2011
कोई इधर आता नहीं |
मेरी आँखें , अब कमज़ोर हो चली हैं |
साफ़ नज़र आता नहीं |
मेरी जुबां , अब लड़खड़ाती है |
साफ़ बोला जाता नहीं |
मेरे आंसू , गालों पर छपे हैं |
कोई पोंछ जाता नहीं |
मेरी गली , अब सूनी हो चली है |
कोई इधर आता नहीं |
इस दर पर भी कभी रौनक थी |
कोई अब चेहचहाता नहीं |
कभी मनती थी यहाँ ईद - दिवाली |
कोई अब सजाता नहीं |
मुझे याद है वो पुरानी धुन |
कोई अब बजाता नहीं |
ये सूनापन, ये एकाकी |
कोई अब मिटाता नहीं |
मेरी गली , अब सूनी हो चली है |
कोई इधर आता नहीं |
कोई इधर आता नहीं |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
साफ़ नज़र आता नहीं |
मेरी जुबां , अब लड़खड़ाती है |
साफ़ बोला जाता नहीं |
मेरे आंसू , गालों पर छपे हैं |
कोई पोंछ जाता नहीं |
मेरी गली , अब सूनी हो चली है |
कोई इधर आता नहीं |
इस दर पर भी कभी रौनक थी |
कोई अब चेहचहाता नहीं |
कभी मनती थी यहाँ ईद - दिवाली |
कोई अब सजाता नहीं |
मुझे याद है वो पुरानी धुन |
कोई अब बजाता नहीं |
ये सूनापन, ये एकाकी |
कोई अब मिटाता नहीं |
मेरी गली , अब सूनी हो चली है |
कोई इधर आता नहीं |
कोई इधर आता नहीं |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
शनिवार, 12 मार्च 2011
मन के ब्याहे हैं ..
मन के ब्याहे हैं ,
दूर चले आये हैं |
मंत्र फेरों के बिना ,
एक दूजे के साए हैं |
मन के ब्याहे हैं ...
न मेहँदी कि रस्म ,
न अगूंठी , न कसम |
न बाराती आये हैं ,
मन के ब्याहे हैं |
चुपचाप आये हैं ,
प्यार ही मिला दहेज़ ,
अपने साथ लाये हैं ,
मन के ब्याहे हैं ...
सात ज़न्मों का न पता ,
इनकी भी न है खता |
अभी ज़िन्दगी कहाँ जी पाए हैं ,
मन के ब्याहे हैं |
आँखों में ख्वाब लिए ,
वफ़ा का सुरूर पिए ,
बेखुद हो छाये हैं |
मन के ब्याहे हैं ...
चाँद तारों से परे ,
मीठी उम्मीद से भरी ,
अपनी हर बात लाये हैं |
मन के ब्याहे हैं |
चलना ही है आगे ,
नापनी ही है इनको |
इनकी जों भी राहें हैं ,
मन के ब्याहे हैं ...
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
दूर चले आये हैं |
मंत्र फेरों के बिना ,
एक दूजे के साए हैं |
मन के ब्याहे हैं ...
न मेहँदी कि रस्म ,
न अगूंठी , न कसम |
न बाराती आये हैं ,
मन के ब्याहे हैं |
चुपचाप आये हैं ,
प्यार ही मिला दहेज़ ,
अपने साथ लाये हैं ,
मन के ब्याहे हैं ...
सात ज़न्मों का न पता ,
इनकी भी न है खता |
अभी ज़िन्दगी कहाँ जी पाए हैं ,
मन के ब्याहे हैं |
आँखों में ख्वाब लिए ,
वफ़ा का सुरूर पिए ,
बेखुद हो छाये हैं |
मन के ब्याहे हैं ...
चाँद तारों से परे ,
मीठी उम्मीद से भरी ,
अपनी हर बात लाये हैं |
मन के ब्याहे हैं |
चलना ही है आगे ,
नापनी ही है इनको |
इनकी जों भी राहें हैं ,
मन के ब्याहे हैं ...
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मौन
दो पलों के बीच की दूरी भरता कौन ?
मौन |
बिन कहे भी बात करता कौन ?
मौन |
हर कोने में छुपा बैठा है कौन ?
मौन |
सब चले जाते हैं रह जाता है कौन ?
मौन |
बहुत होती है यारी दोस्ती आखिर भाता है कौन ?
मौन |
अकेले में रोते हैं तो साथ सिसकता है कौन ?
मौन |
आवाजें मिल जाती हैं आजकल कम दिखता है कौन ?
मौन |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
मौन |
बिन कहे भी बात करता कौन ?
मौन |
हर कोने में छुपा बैठा है कौन ?
मौन |
सब चले जाते हैं रह जाता है कौन ?
मौन |
बहुत होती है यारी दोस्ती आखिर भाता है कौन ?
मौन |
अकेले में रोते हैं तो साथ सिसकता है कौन ?
मौन |
आवाजें मिल जाती हैं आजकल कम दिखता है कौन ?
मौन |
अक्षत डबराल
"निःशब्द"
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