गुरुवार, 16 अगस्त 2012

मुझे पारस बनना है!

हर चीज़ को छू सोना कर दूँ,
खुद में इतना साहस भरना है|
भसम लगाकर मेहनत की,
मुझे पारस बनना है!
मेरा काम ही परिचय बने,
नाम का क्या करना है?
अब और नहीं उद्देश्य कोई,
मुझे पारस बनना है!
समय,प्रारब्ध के वार सहूँ,
मैं उफ़ न एक बार कहूँ|
मुझे खुद का आदर्श बनना है,
मुझे पारस बनना है!
-अक्षत डबराल
"निःशब्द"

रविवार, 29 जुलाई 2012

जब नैना हैं तो, ख्वाब भी होंगे|

जब नैना हैं तो,
ख्वाब भी होंगे|
बसेंगे कुछ तो,
कुछ बर्बाद भी होंगे|
दिल में रहेंगे कुछ कैद तो,
कुछ आज़ाद भी होंगे|
राह में बिछड़ेंगे कुछ तो,
कुछ उम्रभर साथ भी होंगे|
इंसां की फितरत है ख्वाब सज़ाना,
ये आज हैं, मुद्दतों बाद भी होंगे|
जब नैना हैं तो,
ख्वाब भी होंगे!

-अक्षत डबराल
"निःशब्द"

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

हम क्यूँ हाथ जोड़ना भूल गए ?

इतना क्यों ऊपर उठे कि,
खुद को धरती से जोड़ना भूल गए ?
सर उठाना तो याद रहा पर,
हम क्यूँ हाथ जोड़ना भूल गए ?
जंजीरों को तो तोड़ा हमने पर,
क्यूँ दीवारें तोड़ना भूल गए ?
आँख मिलाना रास रहा पर,
हम क्यूँ हाथ जोड़ना भूल गए ?
रिश्तों के लिए क्यूँ अब हम,
मौसमों को मोड़ना भूल गए ?
आज भी दुखता है मन कि,
हम क्यूँ हाथ जोड़ना भूल गए ?
- अक्षत डबराल
"निःशब्द"

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

एक एक लम्हे के जाने का एहसास रहा,
पर दिन की गिनती न याद रही|
न मालूम पड़ा कि गुज़रा एक अरसा,
ना मालूम पड़ा कब उम्र ढली|
अब मायूस रहते हैं अलफ़ाज़ मेरे,
मुद्दत हो गयी जब कलम चली|
कभी कभी निकालता हूँ पुराने पते,
और घूमता हूँ ले उन्हें,
ख्यालों के ये गली, वो गली|
- अक्षत डबराल
"निःशब्द"

सोमवार, 14 मई 2012

सेवा भाव मेरा पित्र है |

सभी देश प्रमियों को समर्पित कविता :

जैसा दिखता हूँ बाहर,
वैसा ही अन्दर का चित्र है |
कर्म में ही है विश्वास,
कर्म ही मेरा चरित्र है |
त्याग मिला विरासत में मुझे,
सेवा भाव मेरा पित्र है |
परिश्रम है मेरा व्यवसाय,
और पसीना मेरा इत्र है |
सत्य ही सदा है धर्म,
और यही धर्म मेरा मित्र है |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

रविवार, 13 मई 2012

ये दिन है नया, नया दौर नहीं ?

ये दिन है नया, नया दौर नहीं ?
जो आज है यहाँ, कभी और नहीं ?
यही थी जीवन पतंग, थी साँसों की डोर यहीं,
पर बहुत कुछ बदला है, जो किया हो गौर कहीं ?
अरमानों की सौ तस्वीरें, हसरतों का था छोर यहीं ,
सपने थे नैना भर भर , उमंगों का था शोर यहीं |
कल और थी चाहत, आज कुछ और सही,
तो कहो ये सच है या नहीं,
ये दिन है नया, नया दौर नहीं ?

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

शनिवार, 12 मई 2012

जितना भी जलें , साथ जलें |

एक नदी की है आस मुझे ,
जो बुझा दे ,
प्रेम की जो है प्यास मुझे |
जो बेल बने , बाँध ले ,
मुझे आज अपनी चोटी से |
जो चाबी बने , आज़ाद करे ,
मुझे दुनिया की मुट्ठी से |
साथ जिसका, जीने का एहसास बने ,
पवित्र हो रिश्ता, मंदिर समान,
और नींव अटूट विश्वास बने |
वो छाँव बने, वो नाव बने ,
जीवन दरिया भर साथ चले |
मैं दिया बनूँ, वो बाती बने,
आत्मसात हो आज हम,
जितना भी जलें , साथ जलें |

- अक्षत डबराल