मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

सड़कों पे भागती ये बेबसियाँ ,
खम्बों से लिपटी सिसकियाँ |
है हर कोई मजबूर लेकिन ,
भगातीं हैं ये मजबूरियां |

यूँ तो कोई किसी का दास नहीं ,
सबकुछ किसी के पास नहीं |
लाख कर कोशिश ख़ास बनो ,
पर तुम आम ही हो , ख़ास नहीं |

दौड़ा लो हसरत के घोड़े ,
पर सह लेना नसीब के कोड़े |
जब तुलेंगे ये दोनों कहीं ,
भारी होंगे कोड़े , और हलके घोड़े |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

1 टिप्पणी:

  1. यूँ तो कोई किसी का दास नहीं ,
    सबकुछ किसी के पास नहीं |
    लाख कर कोशिश ख़ास बनो ,
    पर तुम आम ही हो , ख़ास नहीं |
    waah

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