कवि हृदय मनुष्य का नहीं ,
एक अलग नसल का है |
कभी दुःख में भी सुखी रहता है ,
कभी सुख में भी व्याकुल रहता है |
ये शब्दों का एक गोदाम है ,
भावनाओं से तपता रहता है |
उमड़ घुमड़ कर शब्द आते ,
सब आप ही छपता रहता है |
यूँ किसी को फूल , फूल ही लगता ,
ये पूरी कविता कह जाता |
खींच लाता प्रसंग, भाव, अर्थ ,
गागर में सागर कह जाता |
इसकी दीवारें सुर्ख लाल ही नहीं ,
सातों रंगों से रंगी हैं |
आज काली , उदास हैं ,
कल ख़ुशी से खिली , बसंती हैं |
इसे हर चीज़ में कविता दिखती है ,
और लय का ध्यान रहता है |
कवि हृदय बुढता नहीं ,
हमेशा जवान रहता है ,
हमेशा जवान रहता है |
अक्षत डबराल
"निःशब्द
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