मंगलवार, 2 नवंबर 2010

तुम कौन हो ?

ठण्ड की गर्म धूप हो तुम ,
या नदी की मस्त लहर ?
मुंडेर की पगडण्डी हो या ,
मनमौजी टेढ़ी नहर |

चांदनी हो सकती हो तुम ,
पर इतनी उसकी लौ नहीं |
सपनों में मुझे बुलाता है जों ,
क्या तुम ही हो , कोई और नहीं ?

खुशबू का झोंका हो तुम ,
या बारिश का छींटा हो ?
अनकहा अरमान हो कोई ,
जों उम्मीद पे ही जीता हो ?

डर से छुपायी बात हो तुम ,
या गुनगुनाया गीत कोई ?
अनजाने से दिखते हो ,
या लगते अपने मीत कोई ?

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

2 टिप्‍पणियां:

  1. चांदनी हो सकती हो तुम ,
    पर इतनी उसकी लौ नहीं |
    सपनों में मुझे बुलाता है जों ,
    क्या तुम ही हो , कोई और नहीं ?
    Achchhi aur saarthak rachna.Thanks

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