रविवार, 1 अप्रैल 2012

बोलता हूँ |

माथे पर लकीरें लेकर,
अपना ही ज़ेहन टटोलता हूँ |
मंजिलें बहुत हैं, रास्ते बहुत,
रास्ते में मिले कंकर तोलता हूँ |

कुछ सपने, कुछ अपने, जिनसे रिश्ते बन गए ,
किसको पकडूँ, किसको छोडूँ,
मैं सबको हमसफ़र बोलता हूँ |

सम्भाल कर रखी है हर याद मैंने,
कभी कभी चुपके से,
उस पुराने संदूक को खोलता हूँ |

मेरे नाम कुछ नहीं है शायद,
बस चंद लम्हे, किस्से ही हैं,
जितना माँगा उससे ज्यादा मिला मुझे,
मैं खुद को खुशकिस्मत बोलता हूँ |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

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