सोमवार, 14 मई 2012

सेवा भाव मेरा पित्र है |

सभी देश प्रमियों को समर्पित कविता :

जैसा दिखता हूँ बाहर,
वैसा ही अन्दर का चित्र है |
कर्म में ही है विश्वास,
कर्म ही मेरा चरित्र है |
त्याग मिला विरासत में मुझे,
सेवा भाव मेरा पित्र है |
परिश्रम है मेरा व्यवसाय,
और पसीना मेरा इत्र है |
सत्य ही सदा है धर्म,
और यही धर्म मेरा मित्र है |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

2 टिप्‍पणियां:

  1. लाजबाब, डबराल जी ! देश प्रेम से ओतप्रोत सुन्दर कविता ! जब कभी वक्त मिले, लिखते रहिये !शुभकामनाये !

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  2. धन्यवाद मान्यवर, आपकी अपेक्षा पर खरा उतरने का प्रयत्न करूँगा!

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