रविवार, 18 अप्रैल 2010

हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?

गर्भ में तेरे लावा भरता जा रहा ,
मनुष्य का मर्म मरता जा रहा |
पावन था तू , अब दूषित है |
हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?

जन्म लिया मुनियों ने यहीं ,
दैत्य भी कुछ हुए थे कहीं |
पर अब क्यों हर नर, पिशाच होता जा रहा ?
हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?

तेरी नदियाँ कभी माता थीं,
अन्नदाता , प्राणदाता थीं |
पर अब क्यों उनका आँचल, काला होता जा रहा ?
हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?

तेरे सागर जों की अब मृत हैं ,
इन्हीं सागरों से बना अमृत था|
अब क्यों लगता प्रलय निकट है , घोर कलियुग होता जा रहा ?
हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?

बंधन कभी अटूट होते थे ,
इश्वर से भी इतर होते थे |
पर अब क्यों बस नाम मात्र हैं , सब औपचारिक होता जा रहा ?
हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?

यूँ लगता है चक्र चाल है ,
इस विश्व का ये अंत काल है |
बहुत बढ़ गया पाप यहाँ , नया युग आवश्यक होता जा रहा ?
हे विश्व , तू कहाँ जा रहा ?


अक्षत डबराल
"निःशब्द"

3 टिप्‍पणियां:

  1. I never asked you to be evil, never told you to do treachery;
    It is you, Oh noble man!!! who have diffused the anarchy.

    I gave you all I had, taught you to do, see, and hear no bad;
    But you let me down, in the blind race of keeping ahead.

    Whose wrongdoing is it? Now you vehemently demand;
    Forget it not; it was you, who had the power to command.

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  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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