शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

मुझे शिकायत है ...

ऐ बूंदों ,
मुझे तुमसे शिकायत है |
जब पड़ती हो , बस तन तरती हो |
मन बेचारा जो प्यासा है ,
उसपर कहाँ कब झरती हो ?

ऐ हवा ,
मुझे तुमसे शिकायत है |
मस्त मौला हो जब बहती हो ,
मुख को चूम चूम रहती हो ,
मन बेचारा जो जलता है ,
उससे कब कुछ कहती हो ?

ऐ खुशबू ,
मुझे तुमसे शिकायत है |
मंत्र मुग्ध जब कर देती हो ,
सब कुछ सुगन्धित कर देती हो ,
मन बेचारा जो सादा है ,
उसे कब छू देती हो ?

ऐ मदिरा ,
मुझे तुमसे शिकायत है |
नशा भरपूर कर देती हो ,
गम भुला ज़रूर देती हो ,
मन बेचारा गम में जगता है ,
उसे कब सुला देती हो ?

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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