शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

I know ...

And i know there's a place for me,
better and brighter than i can see.
And i know i will reach there someday,
for it's for me and only me.

Much has come and much has passed,
i've been moved, pushed and tossed.
but never i've laid down my arms,
never i've let the line be crossed.

All i can do is to work and try,
nothing's gained by a curse or cry.
I need to look beyond just running,
all i need is to learn to fly.

--Akshat Dabral

सोमवार, 30 जनवरी 2012

My chat with God

Akshat Dabral on his a bit heavy day today... No differences with God, just a light chat with Him :)

God i know that you are great,
but lets settle it between us,
while i put it to you simple and straight.

With all these people potatoes in your crate,
you find only me to grate?
I always want something else,
and land up with the things i hate?

I often do not complain,
nor iam in this mind's state.
But what to do o almighty,
when events continue you to frustrate.

I plead, please put some goodies here,
please add some sweet to my plate.
What all happens is all yours order,
its all done as you dictate.

-- Akshat Dabral

शनिवार, 28 जनवरी 2012

उफ़ ये दिल्ली , हाय ये दिल्ली ।

ये शहर तुझे बना दे चूहा ,
पीछे भागे बन कर बिल्ली ।
जान हथेली में लिए भागो ,
उफ़ ये दिल्ली , हाय ये दिल्ली ।

 सीधे साधे लोगों की यहाँ ,
लोग बना देते हैं खिल्ली ।
धूर्त, ठगों का शहर है ,
उफ़ ये दिल्ली , हाय ये दिल्ली ।

हर कोई बना है सूरमा यहाँ ,
पर शक्ल है जैसे शेख चिल्ली ।
यहाँ का पानी ही कुछ ऐसा ,
उफ़ ये दिल्ली , हाय ये दिल्ली ।

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

ये सब खेल का हिस्सा हैं , तू बस हाथ बांधे देख ।

जीवन के ये दांव पेंच ,
धक्का मुक्की , ढील खेंच ।
ये सब खेल का हिस्सा हैं ,
तू बस हाथ बांधे देख ।

कभी बर्फ सा ठंडा सब कुछ ,
कभी वसंत की धूप सेंक ।
कभी तपाएगा ये तुझको तम से ,
कभी तैरने को देगा तिनका फेंक ।
ये सब खेल का हिस्सा है ,
तू बस हाथ बांधे देख ।

समय निकल रहा फिसल फिसल ,
जैसे हाथों से जाती है रेत।
अभी दिया है यौवन तुझको ,
आगे पड़नी है छड़ी टेक ।
ये सब खेल का हिस्सा है ,
तू बस हाथ बांधे देख ।

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

बुधवार, 25 जनवरी 2012

त्रेह्सठ वर्ष का हुआ गणतंत्र , किन्तु विचारें , क्या हम सच में हैं स्वतंत्र ?

त्रेह्सठ वर्ष का हुआ गणतंत्र ,
किन्तु विचारें , 
क्या हम सच में हैं स्वतंत्र ?

सड़ते गलते सरकारी तंत्र ,
हर राष्ट्र से लेकर ऋण ।
अपने गौरव का कर समर्पण ,
हम अभी भी हैं परतंत्र ।

स्वदेशी का कोई साथ नहीं करता  ,
हिंदी में कोई बात नहीं करता ।
सभ्यता का हो रहा हरण ।
सभी जानते पापी कसाब को ,
कोई न जानता  कौन था दानी करण।

त्रेह्सठ वर्ष का हुआ गणतंत्र ,
किन्तु विचारें , 
क्या हम सच में हैं स्वतंत्र ?

राष्ट्र के नेताओं की छवि साफ़ नहीं ,
करोड़ों के घोटाले माफ़ हैं , 
गरीब की चोरी माफ़ नहीं ।
नेता तो "शास्त्री जी" के साथ खतम हो गए ,
बाकी तो बस हैं मुद्रा छापने के यन्त्र ।

त्रेह्सठ वर्ष का हुआ गणतंत्र ,
किन्तु विचारें , 
क्या हम सच में हैं स्वतंत्र ?


बढ़ रही है जनसँख्या ,
साथ बढ़ रहे गरीब ।
विवश हों , कोसें नसीब।
दीन हीन भूखे जन ,
उनका कैसा ये गणतंत्र ?

त्रेह्सठ वर्ष का हुआ गणतंत्र ,
किन्तु विचारें , 
क्या हम सच में हैं स्वतंत्र ?
   

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

खानाबदोश

मेरे खानाबदोश होने में कोई दोष नहीं ,
 मुझे ज़िन्दगी का नशा है ,
ज़माने का कोई होश नहीं |
यही है मेरे जीने का अंदाज़ ,
और इसका मुझे कोई अफ़सोस नहीं |

कब बैठा हूँ मैं थककर ,
कब चला हूँ मैं रूककर |
रुकना मेरी फितरत नहीं ,
झुकना मेरी फितरत नहीं |
जो है , जैसा है , वही सही ,
नहीं है, वो मेरी किस्मत नहीं |

कितना खुद को कोसोगे ,
कितनी देगो रब को गाली ?
जब खुद लिख सकते हो नसीब को ,
क्यों भरोसे रखते हो खाली ?
दम भर कर क्यों नहीं कहते ,
ज़िन्दगी जियेंगे शेरों वाली |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

सड़कों पे भागती ये बेबसियाँ ,
खम्बों से लिपटी सिसकियाँ |
है हर कोई मजबूर लेकिन ,
भगातीं हैं ये मजबूरियां |

यूँ तो कोई किसी का दास नहीं ,
सबकुछ किसी के पास नहीं |
लाख कर कोशिश ख़ास बनो ,
पर तुम आम ही हो , ख़ास नहीं |

दौड़ा लो हसरत के घोड़े ,
पर सह लेना नसीब के कोड़े |
जब तुलेंगे ये दोनों कहीं ,
भारी होंगे कोड़े , और हलके घोड़े |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"