मंगलवार, 13 जुलाई 2010

ये दुनिया एक पागलखाना !

अँधा सा युग है ,
नंगा सा ज़माना ,
बेगानी शादी है ,
अब्दुल्ला दीवाना ,
ये दुनिया एक पागलखाना !

कहीं अजीब कपड़ो की सनक ,
बदनामी से नाम की ललक |
बात करने का सज नहीं ,
बने हैं सबसे बड़े सयाना |
ये दुनिया एक पागलखाना !

रोज़ यहाँ नयी नौटंकी ,
उलटी, सीधी , ढंग बेढंगी |
कोई कहीं बयान दे देता ,
कहीं दाखिल होता हलफनामा ,
ये दुनिया एक पागलखाना !

हर कोई अपने आप को अज़ीम है ,
दवा नहीं मालूम पर सब हकीम हैं |
मर्ज़ एक है , अब क्या छुपाना ,
क्या अपना और क्या बेगाना ?
ये दुनिया एक पागलखाना !


इतने पे भी तो बात न रूकती ,
ये दुनिया हँसाने से न चुकती |
मियाँ जिंदा हैं चाक चौबंद ,
किसी ने कर दिया पंचनामा ,
ये दुनिया एक पागलखाना !

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

6 टिप्‍पणियां:

  1. हर कोई अपने आप को अज़ीम है ,
    दवा नहीं मालूम पर सब हकीम हैं |

    Bahut khub likha hai.shubkamnayen.

    उत्तर देंहटाएं
  2. aapkii kavita ne kar diya sabko deewanaa........bahut sundar

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रशंसा के लायक समझा , धन्यवाद ,आप सभी प्रबुद्ध जनों का |

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप की रचना 16 जुलाई के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com
    आभार
    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  5. कहीं अजीब कपड़ो की सनक ,
    बदनामी से नाम की ललक ...

    बहुत खूब ... नये अर्थ तलाशती लाजवाब रचना .....

    उत्तर देंहटाएं