बुधवार, 21 जुलाई 2010

जीवन सैशे में !

अधिकाधिक भारतीयों के अनुरूप अपनी दिनचर्या का भी, " सैशे " एक अभिन्न अंग है ,
उसको ही लेकर, थोड़ा सा उसकी प्रसिद्धी का, अनुचित उपयोग कर रहा हूँ ...

कठोर, निठुर ये जग है ,
विषाक्त, विषैले जन सब हैं |
कैसे मिले उन्मुक्त जीवन ऐसे में ,
ले लीजे , जी लीजे , जीवन "सैशे" में|

कर लगता है श्वांस पर ,
घोड़ा मैत्री रखता घास पर |
कितना भी व्यय करिए पैसे में ,
मिलेगा यही ,जीवन "सैशे" में |

सप्ताह , माह , जीवन पर्यंत ,
इसके श्रृंगार का युद्ध, द्वंद्व |
करते जों बन पड़ता जैसे में ,
पर फल इतना सा ? जीवन "सैशे" में|

व्यतीत करिए हंस कर या रोकर ,
होनी तो रहेगी ही हो कर |
कब आयें यमराज विचित्र वेशे में ,
निचोड़ डाले बचा खुचा, जीवन "सैशे" में |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

1 टिप्पणी:

  1. व्यतीत करिए हंस कर या रोकर ,
    होनी तो रहेगी ही हो कर |
    कब आयें यमराज विचित्र वेशे में ,
    निचोड़ डाले बचा खुचा, जीवन "सैशे" में |
    --
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है!

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