मंगलवार, 21 सितंबर 2010

समझौते !

बचपन से आज तक ,
सुबह से रात तक ,
हम डरते आये हैं |
बस समझौते करते आये हैं |

कमियों से , खुशियों से |
सदियों से, परिस्थितियों से |
अपनी हार करते आये हैं ,
बस समझौते करते आये हैं |

कभी धूप में नंगे पाँव चले हैं ,
कभी बरसात में बेछांव चले हैं |
अपने घाव छुपाया करते आये हैं ,
बस समझौते करते आये हैं |

कुछ पाने को दुआ करते हैं |
खुद से जों हुआ , करते हैं |
कुछ दुआएं भुलाया करते आये हैं ,
बस समझौते करते आये हैं |

यूँ ख्वाब देखने की कीमत नहीं होती ,
पर अब इन्हें देखने की हिम्मत नहीं होती |
इनका किराया अदा करते आये हैं ,
बस समझौते करते आये हैं |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

1 टिप्पणी:

  1. "यूँ ख्वाब देखने की कीमत नहीं होती ,
    पर अब इन्हें देखने की हिम्मत नहीं होती |"

    उत्तम !!

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