शनिवार, 4 जून 2011

कभी मन

कभी मन रहता है ऊन जैसा ,
जिसके रेशे उलझे रहते हैं |
कभी मन रहता है मकड़ी के जाले सा ,
ख़याल जैसे फंसते रहते हैं |

कभी मन रहता है सूखते तालाब सा ,
जिसमें थोड़े ही प्राण रहते हैं |
कभी मन रहता है गर्मी की फसल सा ,
जिसमें थोड़े ही धान रहते हैं |

कभी मन रहता है अँधेरी चौखट सा ,
एक दिए की आस रहती है |
कभी मन रहता है थके मुसाफिर सा ,
अपने सफ़र की प्यास रहती है |

अक्षत डबराल

2 टिप्‍पणियां:

  1. कभी मन रहता है गर्मी की फसल सा ,
    जिसमें थोड़े ही धान रहते हैं |
    bahut badhiyaa

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