शनिवार, 9 जुलाई 2011

मैंने खुद को आईने में देखा , तो ये ख्याल आये

अरे आईने में रहने वाले भाई साहब ,
आपका जुड़वां भाई दिखा था आज ,
क्या कुछ रहा है चल ,
बहुत खुश रहता है आजकल |

मुझे देख के आईने में ,
नज़रें चुरा लेता है सफाई से |
क्या है ये माज़रा ,
कभी पूछिए अपने भाई से |

मुझसे कुछ कहता नहीं ,
आपसे तो कहता ही है |
मेरा तो बस वो हमशक्ल है ,
आपसे तो उसका रिश्ता भी है |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

3 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे देख के आईने में ,
    नज़रें चुरा लेता है सफाई से |
    क्या है ये माज़रा ,
    कभी पूछिए अपने भाई से |
    bahut khoob

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  2. बहुत ही भाव भीनी कविता दिल से निकल कर दिल में प्रवेश करती हुई

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  3. बहुत खूबसूरत ब्लॉग मिल गया, ढूँढने निकले थे। अब तो आते जाते रहेंगे।
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

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