मंगलवार, 5 मई 2009

पीछे मुड़कर देख तू

चला कहाँ से ?
कहाँ खड़ा है ?
दे विचार एक तू |
पीछे मुड़कर देख तू |

तेरे साथ कितने चले ,
लेकिन सब भागे नही |
तू भागा बहुत तेज़ ,
पर है सबसे आगे नही |

इतना आगे तू आया ,
क्या यह इतना आसान है ?
पीछे होकर तुझसे किसीने ,
क्या किया एहसान है ?

हमेशा तू हारा नही ,
कभी हुई तेरी जीत भी है |
उन्ही जीतों के लम्हों से ,
आज जुड़कर देख तू |

उतार फेंक यह उदासी ,
हैरान हो मत झेंप तू |
यह तेरा ही बीता कल है ,
ज़रा पीछे मुड़कर देख तू |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

2 टिप्‍पणियां:

  1. अरे भुला डबराल, ना-ना-ना- ना.... ये तुम जैसे युवा कवियों का काम नहीं पीछे मुड़कर देखना !

    पर्वत खडा निगाहों में,
    नदियाँ पडी है राहो में,
    तर-पार कर इन सबको तुने,
    इक नया मुकाम पाना है !
    पीछे मुड़कर मत देख मेरे भाई
    अभी बहुत दूर तक जाना है !!

    राह अपनी सतत चलते जाना
    न कही जीत हार का भाव लगाना
    फूल मिले या फिर कांटो की सेज,
    तुम्हे तो साहित्य-धर्म निभाना है !
    पीछे मुड़कर मत देख मेरे भाई
    अभी बहुत दूर तक जाना है !!
    -गोदियाल

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