शुक्रवार, 1 मई 2009

किस काम की

सुबह से ही , प्रतीक्षा होती , एक सिन्दूरी शाम की |
फीकी सी ही बीत जाए , वह शाम किस काम की |

नशा होता जिसमें गहरा , वाह - वाह होती उस जाम की|
जो चढा सुरूर उतारे , वह सुरा किस काम की |

जहाँ देवता न बसते , कौन सुध लेता उस धाम की |
जिससे दर्द कम न होता , वो दवा किस काम की |

जिसे कोई न पहचाने , क्या बात हो उस नाम की |
जिससे कुछ खरीद न पाये , वो मुद्रा किस काम की |

रंग हो जिसमें भरा , वो स्मृति किस काम की |
मन पुलकित हो जिसे पढ़कर , ऐसी कृति किस काम की |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

2 टिप्‍पणियां:

  1. "फीकी सी ही बीत जाए , वह शाम किस काम की |"

    बहुत बढिया !

    भाई साहब, इसीलिये मैं पहले से स्टॉक जमा करके रखता हूँ !

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