गुरुवार, 21 मई 2009

कम पड़ गया |

तान सीना , हाथ तलवार ले ,
युद्घ मैं लड़ गया |
पर कहीं शायद मेरा ,
प्रयास कम पड़ गया |

अंत समय तक मैंने ख़ुद को ,
थकने न तनिक दिया |
उस क्रूर शत्रु ने ,
वार अधिक और अधिक किया |

बचा न यहाँ कोई साथी ,
अकेला ही बढ़ गया |
कितना चलता आगे , कुछ देर बाद ,
पत्थर बन कर जड़ गया |

मुझे गर्व है की मैं ,
पूरे दम से लड़ गया |
पर दर्द बस इतना है की ,
प्रयास कम पड़ गया |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

5 टिप्‍पणियां:

  1. प्रयास जारी रखें, I'm sure, अगली बार कम नहीं पड़ेगा !

    हां एक बात और कहना चाहता था कि आप थोडा सा अपनी प्रोफाइल को modify करके वर्ड वेरिफिकेशन हटा दे , क्योंकि इससे क्या होता है कि अगर कोई अपनी प्रतिक्रिया देना भी चाहे तो वर्ड वेरिफिकेशन की वजह से पहली बार में जब पोस्टिंग के लिए क्लिक्क करो तो मेसेज पोस्ट नाहे होता और प्रतिक्रिया देने वाला दिक्कत समझता है !
    धन्यवाद !

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  2. अक्षत,
    सुन्दर अभिव्यक्ति है मगर मुझे ते रचना कुछ पुरानी लगी क्योकि जहाँ तक मुझे लगता है अब इस तरह की कविता लोग कम लिखते है क्या मेरा अनुमान सही है ?
    वीनस केसरी

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  3. maanyavar yeh meri apni rachna hai, yadi puraani gyaat ho to pata nahin.

    Main bhi koi pakka kavi nahi, bass aise hi likh leta hun :)

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  4. Nahee dabraal bhai, Kesari saahab ka kahna yeh hai ki kavita mein talwaar utha kar ladna ek puraanee baat ho gayi hai. Ab kuch naya aana chahiye jaise:
    Taan Seena,utha bandook
    युद्घ मैं लड़ गया |
    पर कहीं शायद मेरा ,
    प्रयास कम पड़ गया

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