सोमवार, 20 अप्रैल 2009

हर कोई भाग रहा है

चैन नही एक भी पल , सोये में भी जाग रहा है |
आज वक्त से होड़ लगाए , हर कोई भाग रहा है |

आगे बढ़ाने को ख़ुद को , दूसरे का रास्ता काट रहा है |
अपने में ही सिमटा जा रहा , दूसरों से न वास्ता रहा है |

महत्वाकांक्षाएं इसकी जो भी हैं , वो हद से बढ़ी हैं |
सारी भावनाएं इसकी , इसी की भेंट चढ़ी हैं |

परिवार तो दूर ठहरा , ख़ुद के लिए भी अवकाश नही |
इस आपा - धापी में क्या खो रहा , इसका इसको एहसास नही |

प्राप्ति पर भी साँस न लेता , हाथ बढ़ा और मांग रहा है |
हलके भी चल सकता है , पर हर कोई भाग रहा है |

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

1 टिप्पणी:

  1. हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं ...........
    इधर से गुज़रा था, सोचा, सलाम करता चलूं ऽऽऽऽऽऽऽऽ
    -(बकौल मूल शायर)

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