मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

जीवन कितना कम है |

जी ले - जी ले जी भर के , अभी साँसों में दम है |
थोड़ा पड़ता है हमेशा , जीवन कितना कम है !

पानी का यह बुलबुला , कुछ समय में फूट जाता है |
आँख झपकती है और , संसार से नाता टूट जाता है |

बस एक स्वप्न प्रतीत होता है |
जो अभी है , पल भर में अतीत होता है |

ज़रा से सफर में , कभी खुशी , कभी गम है |
हर पड़ाव की अपनी अलग सरगम है |

अंत होता यह , जब साथ लेने आया यम् है |
सत्य है, जितना भी मिला , जीवन कितना कम है !

अक्षत डबराल
"निःशब्द"

2 टिप्‍पणियां:

  1. ज़रा से सफर में , कभी खुशी , कभी गम है |
    हर पड़ाव की अपनी अलग सरगम है |

    ज़िन्दगी की सरगम के सुरों में है दम
    उसी सरगम से कभी खुशी कभी है गम

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